परिचय:
संयुक्त राज्य अमेरिका के सर्वोच्च न्यायालय ने एक ऐतिहासिक कर मामले में एक कैथोलिक चैरिटी संस्था के पक्ष में फैसला सुनाया है, जिसमें धार्मिक स्वतंत्रता और चर्च एवं राज्य के पृथक्करण के सिद्धांत की पुष्टि की गई है। आवर लेडी ऑफ ग्वाडालूप स्कूल बनाम मॉरिससे-बेरु और सेंट जेम्स स्कूल बनाम बील, यह मामला इस सवाल पर केंद्रित था कि क्या सरकार धार्मिक स्कूलों पर ऐसे रोज़गार नियम लागू कर सकती है जो उनके धार्मिक विश्वासों के आधार पर शिक्षक चुनने के अधिकार का उल्लंघन करते हों। अदालत के इस फैसले के धार्मिक संस्थानों और धार्मिक स्वतंत्रता व सरकारी निगरानी के बीच के नाज़ुक संतुलन पर दूरगामी प्रभाव पड़ेंगे।
सुप्रीम कोर्ट ने कर मामले में कैथोलिक चैरिटी का पक्ष लिया
सुप्रीम कोर्ट ने 7-2 के बहुमत से फैसला सुनाया कि दोनों कैथोलिक स्कूल, आवर लेडी ऑफ ग्वाडालूप स्कूल और सेंट जेम्स स्कूल, कुछ रोज़गार कानूनों के अधीन नहीं हैं। अदालत ने कहा कि प्रथम संशोधन का "फ्री एक्सरसाइज़ क्लॉज़" धार्मिक संस्थानों को अपनी धार्मिक मान्यताओं के आधार पर शिक्षक चुनने के अधिकार की रक्षा करता है और सरकार इस अधिकार में हस्तक्षेप नहीं कर सकती। यह फैसला धार्मिक स्कूलों को कुछ रोज़गार कानूनों से प्रभावी रूप से छूट देता है, जिनमें भेदभाव और भेदभाव-विरोधी कानून भी शामिल हैं।
अदालत ने तर्क दिया कि कैथोलिक स्कूलों की तरह धार्मिक स्कूल भी मूलतः धार्मिक संस्थान हैं और उनका प्राथमिक उद्देश्य अपनी धार्मिक मान्यताओं का प्रचार करना है। उन्होंने तर्क दिया कि सरकार को धार्मिक स्कूलों पर रोज़गार संबंधी नियम लागू करने की अनुमति देना "धर्म के स्वतंत्र अभ्यास पर अनुचित रूप से बोझ डालना" होगा। बहुमत की राय में इस बात पर ज़ोर दिया गया कि सरकार धार्मिक संस्थानों के धार्मिक चरित्र को निर्धारित नहीं कर सकती और पहला संशोधन धार्मिक संगठनों को अपने नेता और शिक्षक चुनने के अधिकार की रक्षा करता है।
धार्मिक समूहों को कर छूट का फैसला मिला
धार्मिक समूहों और धार्मिक स्वतंत्रता के पैरोकारों ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का स्वागत किया है। उनका तर्क है कि यह फैसला धार्मिक संस्थाओं के स्वायत्त रूप से संचालित होने और अपनी आस्था के आधार पर अपने नेता और शिक्षक चुनने के अधिकार की रक्षा करता है। उनका यह भी तर्क है कि यह फैसला सरकार को धार्मिक संगठनों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करने से रोककर चर्च और राज्य के पृथक्करण के सिद्धांत को कायम रखता है।
इस फैसले की कुछ लोगों ने आलोचना भी की है, जिनका तर्क है कि यह कर्मचारियों के अधिकारों का हनन करता है और भेदभाव का रास्ता खोल सकता है। उनका तर्क है कि इस फैसले से धार्मिक स्कूलों को शिक्षकों के धर्म, लिंग या यौन अभिविन्यास के आधार पर उनके साथ भेदभाव करने की अनुमति मिल सकती है। उनका यह भी तर्क है कि यह फैसला धार्मिक संस्थानों को विनियमित करने की सरकार की क्षमता के लिए एक खतरनाक मिसाल कायम करता है।
सारांश:
सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय आवर लेडी ऑफ ग्वाडालूप स्कूल बनाम मॉरिससे-बेरु और सेंट जेम्स स्कूल बनाम बील धार्मिक स्वतंत्रता और चर्च एवं राज्य के पृथक्करण पर इसके महत्वपूर्ण प्रभाव हैं। हालाँकि यह निर्णय धार्मिक संस्थानों को अपनी धार्मिक मान्यताओं के आधार पर अपने शिक्षक चुनने के अधिकार की पुष्टि करता है, लेकिन यह संभावित भेदभाव और धार्मिक संस्थानों को विनियमित करने की सरकार की क्षमता को लेकर भी चिंताएँ पैदा करता है। यह मामला संयुक्त राज्य अमेरिका में धर्म और सरकार के बीच जटिल और अक्सर विवादास्पद संबंधों को उजागर करता है और धार्मिक स्वतंत्रता और व्यक्तिगत अधिकारों की सुरक्षा के बीच एक नाजुक संतुलन की आवश्यकता पर ज़ोर देता है।
